भारतीय वायुसेना (IAF) अपनी सामरिक एयरलिफ्ट क्षमता को और अधिक घातक और आधुनिक बनाने के लिए पूरी तरह तैयार है।
वायुसेना के बहुप्रतीक्षित 'मीडियम ट्रांसपोर्ट एयरक्राफ्ट' (MTA) प्रोग्राम के लिए जल्द ही औपचारिक 'रिक्वेस्ट फॉर प्रपोजल' (RFP) जारी होने की उम्मीद है। इसके तुरंत बाद, दुनिया के सबसे बेहतरीन सैन्य ट्रांसपोर्ट विमानों के तकनीकी मूल्यांकन और कड़े ट्रायल्स का दौर भारत की सरज़मीं पर शुरू होगा।
लगभग ₹1 लाख करोड़ के इस विशालकाय सौदे के तहत, वायुसेना अपने पुराने पड़ चुके सोवियत युग के एंतोनोव An-32 और इल्यूशिन Il-76 बेड़े को बदलना चाहती है।
वायुसेना को ऐसे 60 से 80 नए विमानों की तलाश है, जो न सिर्फ आधुनिक हों, बल्कि 'मेक इन इंडिया' पहल के तहत देश में ही बनाए जाएं।
मैदान में तीन दिग्गज और 'आत्मनिर्भर भारत' का संकल्प
इस ऐतिहासिक मुकाबले में दुनिया के तीन सबसे शक्तिशाली एविएशन प्लेटफॉर्म आमने-सामने हैं।इस पूरी प्रक्रिया को भारत के domestic defence (घरेलू रक्षा) इकोसिस्टम से जोड़ने के लिए इन विदेशी कंपनियों ने प्रमुख भारतीय घरानों से हाथ मिलाया है:
- Embraer C-390 मिलेनियम (ब्राज़ील): लगभग 26 टन पेलोड क्षमता वाला यह जेट-पावर्ड विमान अपनी तेज़ रफ्तार के लिए जाना जाता है। एम्ब्रेयर ने भारत में इसके निर्माण के लिए महिंद्रा डिफेंस के साथ साझेदारी की है।
- Lockheed Martin C-130J सुपर हरक्यूलिस (अमेरिका): लगभग 20 टन पेलोड क्षमता वाला यह टर्बोप्रॉप विमान वायुसेना के बेड़े में पहले से ही अपनी धाक जमा चुका है (वर्तमान में 12 विमान सेवारत हैं)। लॉकहीड ने टाटा एडवांस्ड सिस्टम्स (TASL) से हाथ मिलाया है। वे इस ट्रायल में C-130J का एक अपग्रेडेड और अधिक क्षमता वाला वर्जन पेश करने वाले हैं।
- Airbus A400M एटलस (यूरोप): यह 37 टन की भारी-भरकम क्षमता वाला विमान है। अपनी विशाल पेलोड क्षमता के कारण यह सबसे ताकतवर, लेकिन इस रेस का सबसे महंगा विकल्प भी माना जा रहा है।
वहीं, C-130J के साथ वायुसेना का पहले से ही शानदार परिचालन अनुभव रहा है, इसलिए इसके अपग्रेडेड वर्जन के ट्रायल्स की प्रक्रिया एकदम नए विमानों की तुलना में थोड़ी अलग हो सकती है।
चुनौतीपूर्ण ट्रायल्स: युद्ध के असली हालात और 'ज़ोरावर' टैंक का फैक्टर
सूत्रों के मुताबिक, भारतीय वायुसेना इन विमानों का टेस्ट बिल्कुल असली युद्ध जैसी परिस्थितियों (Real Battlefield Conditions) में करेगी।इसमें सबसे अहम होगा 'हाई-ऑल्टिट्यूड' (अधिक ऊंचाई) और भीषण गर्मी वाले पश्चिमी और उत्तर-पूर्वी सेक्टरों में इनका प्रदर्शन।
सैन्य उड्डयन (Military Aviation) की तकनीक को समझें तो, ऊंचाई वाले इलाकों (जैसे लद्दाख) में हवा पतली हो जाती है। पतली हवा के कारण विमान के इंजन को कम ऑक्सीजन मिलती है, जिससे उसका 'थ्रस्ट' (धक्का) घटता है और पंखों को कम 'लिफ्ट' (उठाव) मिलती है।
ऐसी दुर्गम परिस्थितियों में छोटे और बिना पक्की सड़क वाले रनवे से भारी वजन के साथ सुरक्षित उड़ान भरना एक बहुत बड़ी इंजीनियरिंग चुनौती है।
रिपोर्ट्स के अनुसार, इन ट्रायल्स के दौरान विमानों में डमी (नकली) कार्गो लोड रखा जाएगा।
इसके पीछे एक बड़ी रणनीतिक वजह भारत का नया 25-टन का स्वदेशी 'ज़ोरावर' (Zorawar) लाइट टैंक भी है। वायुसेना की प्राथमिकता एक ऐसा विमान चुनना है जो इस टैंक और अन्य भारी हथियारों को सीधे दौलत बेग ओल्डी (DBO) जैसे सीमावर्ती एडवांस लैंडिंग ग्राउंड्स तक आसानी से पहुंचा सके।
इन पैमानों पर होगी कड़ी परख
ट्रायल्स के दौरान वायुसेना मुख्य रूप से इन मापदंडों का मूल्यांकन करेगी:- पेलोड क्षमता: दुर्गम और ऊंचाई वाले इलाकों में विमान अधिकतम कितना वजन सुरक्षित रूप से उठा सकता है।
- शॉर्ट टेकऑफ़ और लैंडिंग (STOL): छोटे या कच्चे रनवे पर उतरने और उड़ान भरने की ताकत।
- रेंज और एंड्योरेंस: एक बार ईंधन भरने पर विमान कितनी दूर तक जा सकता है और कितनी देर हवा में रह सकता है।
- रखरखाव और विश्वसनीयता: चुनौतीपूर्ण और धूल भरे मौसम में विमान का मेंटेनेंस कितना आसान है।