स्वदेशी 'विरुपाक्ष' AESA रडार का प्रोटोटाइप निर्माण शुरू, भारतीय वायुसेना के Su-30MKI बनेंगे और भी घातक

स्वदेशी 'विरुपाक्ष' AESA रडार का प्रोटोटाइप निर्माण शुरू, भारतीय वायुसेना के Su-30MKI बनेंगे और भी घातक


भारतीय वायुसेना (IAF) के सबसे भरोसेमंद लड़ाकू विमान Su-30MKI को आधुनिक युद्ध के लिए तैयार करने का महात्वाकांक्षी "सुपर सुखोई" (Super Sukhoi) प्रोग्राम एक ऐतिहासिक मुकाम पर पहुंच गया है।

रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO) की प्रयोगशाला LRDE द्वारा विकसित किया जा रहा स्वदेशी 'विरुपाक्ष' (Virupaksha) AESA रडार अब कागजी डिजाइन से बाहर निकलकर हकीकत का रूप ले रहा है।

यह रडार इस पूरे आधुनिकीकरण अभियान का सबसे अहम हिस्सा है, जो Su-30MKI को पहले से कहीं अधिक उन्नत, अचूक और घातक कॉम्बैट प्लेटफॉर्म में बदल देगा।

सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार, इस रडार का डिजाइन चरण सफलतापूर्वक पूरा हो चुका है और अब इंजीनियरों ने इसके पहले फुल-स्केल प्रोटोटाइप (नमूने) का निर्माण शुरू कर दिया है।

साल 2025 के अंत में ही रडार के हार्डवेयर को असेंबल करने और जमीनी परीक्षण के लिए जरूरी इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार कर लिया गया था।

अब यह प्रोजेक्ट उस चरण में है जहां मुख्य पुर्जों को एक साथ जोड़कर उनकी टेस्टिंग की जा रही है, जिसके बाद इसे हवाई परीक्षणों के लिए भेजा जाएगा।

'उत्तम' का महाविनाशक संस्करण है 'विरुपाक्ष'​

विरुपाक्ष रडार असल में स्वदेशी 'उत्तम' (Uttam) AESA रडार का ही एक विशाल और अधिक शक्तिशाली स्वरूप है, जिसे भारत के तेजस (Tejas) फाइटर जेट्स के लिए बनाया गया है।

जहां उत्तम रडार 125 से अधिक सफल परीक्षण उड़ानें पूरी कर चुका है, वहीं Su-30MKI के विशाल आकार और भारी पावर क्षमता को देखते हुए विरूपाक्ष का निर्माण एक कहीं अधिक जटिल तकनीकी चुनौती है।

इस रडार में लगभग 2,400 ट्रांसमिट-रिसीव (TR) मॉड्यूल्स का इस्तेमाल किया गया है, जो इसे दुनिया के सबसे ताकतवर फाइटर रडारों की श्रेणी में खड़ा करता है। (तुलना के लिए: फ्रांस के राफेल में लगभग 1,200 और तेजस में करीब 700 TR मॉड्यूल्स होते हैं)।

तकनीक को समझें: GaN कैसे बदलता है युद्ध के नियम?​

यह रडार अत्याधुनिक गैलियम नाइट्राइड (GaN) सेमीकंडक्टर तकनीक पर आधारित है।

सरल शब्दों में: पुरानी गैलियम आर्सेनाइड (GaAs) और PESA तकनीक की तुलना में, GaN तकनीक रडार को कम गर्मी पैदा करते हुए कहीं अधिक पावर जेनरेट करने की क्षमता देती है।

इसका सीधा मतलब है कि यह रडार 400 किलोमीटर से भी अधिक दूरी से दुश्मन को देख सकता है। ओपन-सोर्स रिपोर्ट्स के मुताबिक, यह एक साथ 64 से 100 टारगेट्स को ट्रैक कर सकता है और हवा में एक साथ 6 मिसाइलों को गाइड करके दुश्मन को खाक कर सकता है।

Su-30MKI में फिलहाल लगा रूसी N011M Bars रडार 650 किलो का है, जबकि आधुनिक तकनीक से लैस विरूपाक्ष का वजन काफी कम होने का अनुमान है, जिससे बचा हुआ वजन एयरक्राफ्ट के अन्य उपकरणों और घातक हथियारों में लगाया जा सकेगा।

'मेक इन इंडिया' की ताकत और परीक्षण का दौर​

इस अत्याधुनिक रडार का निर्माण भारत के प्रमुख एयरोस्पेस और इलेक्ट्रॉनिक्स कंपनियों के कंसोर्टियम (समूह) के जरिए किया जा रहा है।

इसमें अस्त्र माइक्रोवेव प्रोडक्ट्स लिमिटेड (Astra Microwave) उच्च-आवृत्ति वाले GaN मॉड्यूल्स बना रही है, जबकि लार्सन एंड टुब्रो (L&T) और हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (HAL) इसके निर्माण और इंटीग्रेशन में अपना अहम योगदान दे रहे हैं।

रडार के शुरुआती परीक्षण शुरू हो चुके हैं। फरवरी 2026 के अंत में इसका पहला लेबोरेटरी "पावर-ऑन" टेस्ट (जिसे 'फर्स्ट लाइट' कहा जाता है) किया गया। इन शुरुआती परीक्षणों में रडार के एडवांस बीम-फॉर्मिंग सॉफ्टवेयर और हाई-पावर GaN मॉड्यूल्स से निकलने वाली अत्यधिक गर्मी को संभालने वाले कूलिंग सिस्टम को परखा जा रहा है।

फाइटर जेट में लगाने से पहले, इलेक्ट्रोमैग्नेटिक कम्पैटिबिलिटी (EMC) जांचने के लिए एक स्थिर Su-30 के नोज़ (आगे के हिस्से) का इस्तेमाल किया जा रहा है। यह यह सुनिश्चित करेगा कि रडार विमान के अन्य इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों के साथ बिना किसी रुकावट के काम करे।

इसके अलावा, DRDO के खास एयरबॉर्न रडार टेस्ट प्लेटफॉर्म 'हॉकर 800' (Hawker 800) जेट पर भी इसके कुछ हिस्सों को परखा जा रहा है।

भविष्य का रोडमैप​

इन कठिन जमीनी परीक्षणों के बाद, 2028 की शुरुआत में एयरक्राफ्ट एंड सिस्टम्स टेस्टिंग एस्टेब्लिशमेंट (ASTE) द्वारा एक विशेष Su-30MKI विमान पर इसके पूर्ण हवाई परीक्षण (Flight Trials) शुरू होने की उम्मीद है।

इन परीक्षणों में असली युद्ध जैसे हालात, जैसे हवा से हवा में मार करने, टारगेट ट्रैकिंग और इलेक्ट्रॉनिक युद्ध (Electronic Warfare) के बीच इसकी असली ताकत को आंका जाएगा।

विरुपाक्ष AESA रडार 'सुपर सुखोई' प्रोग्राम का तकनीकी ब्रह्मास्त्र है। भारत के अस्त्र (Astra) जैसी स्वदेशी मिसाइलों और इस नए रडार के घातक संयोजन से Su-30MKI की उम्र और मारक क्षमता कई गुना बढ़ जाएगी।

यह अपग्रेड भारतीय वायुसेना की रीढ़ माने जाने वाले इस फाइटर बेड़े को आने वाले कई दशकों तक दुश्मन के लिए काल बनाए रखेगा, जिससे भारत का रक्षा क्षेत्र पूर्ण रूप से आत्मनिर्भर बन सकेगा।
 

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